Monday, November 17, 2008

रिश्ते ...

रिश्ते - ऐसे नहीं बनते .. सच कहा है यह किसी ने …
विश्वास और भावनाओ के जोड़ का फल होता है कोई भी रिश्ता . जहा प्यार, सम्मान , ख़याल और समर्पण की भावना हो . जहा यह भाव ना हो वो रिश्ते कुछ ही समय मैं ताश के पत्तो के महल की तरह हवा के हलके झोके से भी बिखर जाते है … तब मन सोचने लगता है की क्यों भावनाओ की जोड़ नहीं जुड़ रही या कहा अपनी पकड़ छोड़ रही है ? फिर अगले ही पल प्रतीत होता है की यह सिर्फ भावनात्मक ज्ञान का आभाव है, जो किसी भी रिश्ते की नींव हिला देता है .
यह देखने में आता है की, जो रिश्ते शुरुवात में बहोत मजबूत लगते हे, उसकी बुनियाद कुछ दिनों के अन्तराल में मजबूत होने की जगह कमजोर पड़ने लगती है , एसा शायद इसी लिए होता है क्यों की रिश्तो में आपसी भावनात्मक ज्ञान नहीं होता… जब तक यह समझ ना आये रिश्ते एसे ही बनते - बिगड़ते रहेंगे ….
यह भावनात्मक ज्ञान क्या होता है ?
यह किसी व्यक्ति को जानने या समझने का ज्ञान है, खुद पर नियंत्रण रखने का , दुसरो के एहसास को पहचान कर अपने एहसास वहा तक पहुचाने का ज्ञान है . जब किसी व्यक्ति में इन भावनाओ का महत्व और समझ होगी तभी वो किसी रिश्ते को पूर्णता तक ले जा सकता है .

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