" हर कोई अपनी जिन्दगी के तमाम मुकाम तय करता है। हर प्रत्येक मुकाम उसे कुछ न कुछ ऊंचाई दे कर जाते है, पर ऐसा भी होता है, कि हम अपने आपको उस मुकाम पर पाते है, कि ख़ुशी या ग़म सब अपने इख्तियार से बाहर नज़र आता है । क्या ये हमारी आदमियत कि सीमाये है, या ईश्वर का दिशा-निर्देश कि, बस यही तक, यही तक हमारा बस है, हम पर । वक़्त रुकता नही और हम भी वक़्त के साथ पल -प्रतिपल बदलते रहते है । यह स्वीकार करना ही चाहिऐ कि वक़्त और व्यक्ति दोनो बदलते रहते है। हां ये अलग बात है कि आदमी का बदलना ज्यादा कष्ट देता है । "
Tuesday, November 18, 2008
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